दो मित्रों की मित्रता :: विकुति
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नरोत्तम और पुरुषोत्तम अत्यंत धनिष्ठ यानी तू- तड़ाक वाले मित्र हैं। दोनों लंगोटिया यार नहीं है ,क्योंकि इनकी मित्रता भारतीय हिसाब से तीसरे पन में हुई थी ,जो अभी चौथे पन में भी चल रही है। नरोत्तम पुरुषोत्तम से लगभग 4 साल छोटे हैं। नरोत्तम का मानना है कि उनकी मित्रता कृष्ण सुदामा जैसी है , यद्यपि दोनों ही राजा हैं। नरोत्तम केवल राजा है जबकि पुरुषोत्तम महा राजा है। यहां शीश पगा न झगा तन में-------, कोदो, संवा जूरतो भरि पेट तो—---" की स्थिति नहीं है। हां यह जरूर कहा जा सकता है कि नरोत्तम कोदो संवा को श्री अन्न मान कर, सुखे मेवों के साथ खाते हैं। दिन में तीन चार बार डिजाइनर कपड़े बदलते हैं। सबसे महंगा चश्मा, घड़ी का इस्तेमाल करते हैं। कीमती मोटर गाड़ियों और जहाज पर यात्रा करने का शौक रखते हैं। फिर भी नरोत्तम पुरुषोत्तम से गरीब माने जाते हैं। नरोत्तम भी मानते हैं कि गरीब बने रहने में ही भलाई है ।
अफसोस की बात है कि अभी पिछले दिनों बिना बात के बात उनके रिश्तों में कुछ खटास आ गई थी। बात इतनी सी थी कि कहां तो भक्तों सहित नरोत्तम, पुरुषोत्तम की जीत का जश्न मना रहे थे, लेकिन पुरुषोत्तम ने तो राजतिलक के उत्सव का निमंत्रण भी इनको नहीं भेजा। नरोत्तम को इस बात से बहुत रंज हुआ। उन्होंने अपने मन को दिलासा दिया, हो सकता है भीड़-भाड़ में मेरा नाम छूट गया हो।
ऐसे में मित्र को याद दिलाना भी फर्ज था। उन्होंने एक तरकीब चली। अपने कुछ खास लोगों को पुरुषोत्तम के राज्य में भेज दिया। इनका काम केवल यह था कि, ये वक्त बेवक्त पुरुषोत्तम के सामने पड़ते रहें। उम्मीद थी की इनको देखकर पुरुषोत्तम को नरोत्तम की याद आ जाएगी, और तुरंत निमंत्रण भेज दिया जाएगा। ये लोग , मुस्तैदी से अपना काम करते रहे किंतु पुरुषोत्तम को नरोत्तम की याद नहीं आई तो नहीं आई । नरोत्तम संताप ग्रस्त हो गए। दिन रात सोचते रहते थे कि आखिर उनसे किस भूल का बदला लिया जा रहा है। जिस दोस्त के लिए उन्होंने वोट मांगा ,नमस्ते कार्यक्रम कराया, हवन कराया वही दोस्त उन्हें भूल गया। हाय !हाय! रे दुर्भाग्य। मन मार कर बिना , निमंत्रण के उत्सव में नहीं गए। आखिर मन को कब तक मनाते । एक दिन मित्र को भूल सुधार का मौका देने के लिए उत्सव के बाद उनके देश पहुंच गए । उनको पूरी आशा थी कि उनको आया जानकर मित्र द्वार पर ही उनसे लिपट जाएगा। जैसा कृष्ण भगवान सुदामा से मिले थे। यही सोचते हुए महल के द्वार पर पहुंचकर खबर कराई। उनकी आंखें द्वार पर ही लगी हुई थी। मित्र तो नहीं आया ,एक साधारण दासी उनको लेने आ पहुंची । अत्यंत खिन्न मन से, वे दासी के साथ अंत;पुर में पहुंचे । मित्र को देखते ही उन्होंने उसे अंक पाश में जकड़ लिया। प्रेम इतना उमड़ा कि ये उसे छोड़ ही नहीं रहे थे। वहां पर खड़े सहायकों ने इनको छुड़ाया ।फिर मित्र ने बहुत मधुर शब्दों में अपनी बिरह वेदना बताइ। यह सुनकर इनका दिल जल भून गया। इन्होंने मन ही मन गाली देते हुए सोचा इतनी बेवफाई कर, कैसी मीठी मीठी बातें कर रहा है। खैर फिर कुशल छेम हुआ और पुरुषोत्तम ने व्यापार की बात शुरू कर दी। पूरी बातचीत में पुरुषोत्तम इनको प्रिय मित्र और महान नेता बताते हुए धूसता रहा। जब नरोत्तम में एतराज किया तो पुरुषोत्तम बोले “प्रिय मित्र हमारी दोस्ती तो अमर है किंतु तुम्हारे देश को तो भुगतना ही पड़ेगा। तुम महान नेता और प्रिय मित्र हो लेकिन इससे तुम्हारा देश कैसे बचेगा। यह सुनकर नरोत्तम के कलेजे में ठंडक पड़ गई। उन्होंने सोचा चलो मित्र हमसे तो नाराज नहीं है, देश से है तो हुआ करें। अब मीटिंग खत्म होने वाली थी। नरोत्तम को यही अफसोस हो रहा था कितनी दूर से आए और मालानी भाभी से दुआ सलाम भी नहीं हो पाई । बेचारी कितना प्रेम करती हैं।
हद तो तब हो गई जब पुरुषोत्तम का एक जमूरा बाल बच्चों सहित इनसे मिलने आ गया। उससे यह क्या बात करते बच्चों से लिली लिली टी टी करते रहे ,और मीटिंग समाप्त हो गई। लौटते हुए एक पत्रकार ने उन्हें घेर लिया। उसने ऐसा सवाल पूछा कि उनके तन बदन आग लग गई। किसी तरह इन्होंने दोनों हाथ फटक पटक कर कडा़ उत्तर दे दिया। कुछ लोग मानते हैं कि पुरुषोत्तम ने ही पत्रकार को लहका दिया था। वह भी केवल मजा लेने के लिए। ।
वापसी में जहाज में बैठे हुए नरोत्तम सोच रहे थे, आए तो लेकिन कायदे से बैठकी भी नहीं हो पाई। उन्हें यह भी अफसोस हो रहा था कि वह कोई भेंट भी नहीं ला पाए। अब कभी फुर्सत में आना जरूरी लगता है। इन्हीं सब विचारों में डूबे हुए नरोत्तम अपने देश पहुंच गए। देश में वैसे ही किचाइन मची हुई थी। अभी जल्दी ही पड़ोसी से थोड़ा हाथा पाई हो गई थी। नरोत्तम का कहना है कि उन्होंने पड़ोसी को काम भर कूट दिया था । जब वह हाथ जोड़कर गिड़ -गिडा़ने लगा तो उन्होंने उसे माफ कर ,लड़ाई खत्म कर दी। उधर पुरुषोत्तम अलग ही राग अलाप रहे हैं,।कहते हैं उन्होंने दोनों का कान पड़कर धंधे की धमकी देकर इनका हाथ मिलवा दिया था।
अब दिक्कत यह है कि नरोत्तम के देश में लोग बड़े खुर- पेची हैं ,वे पुरुषोत्तम की बात मान ले रहे हैं । उनका कहना है कि नरोत्तम जन्म से ही लबार हैं ,इनकी बात का क्या ठिकाना? नरोत्तम इसी से तिल मिलाए हुए हैं। ये खुलकर कहते भी नहीं की पुरुषोत्तम अनायास हांक रहे हैं । कुछ लोग कहते हैं नरोत्तम डर से नहीं बोल रहे हैं ,जबकि दूसरे लोग कह रहे हैं कि आखिर दोस्ती भी कोई चीज है। नरोत्तम पहले भी अपने दूसरे दोस्तों के लिए क्या-क्या नहीं सुनते रहे हैं । यहां तक की भरे दरबार में भी कुछ उदंडों ने इनको क्या नहीं कहा। तब भी कहां कुछ बोले ? जिसके मुंह में जो आए कहे, इससे क्या आता जाता है? मौका आएगा तो जवाब भी दे देंगे ,तब यह तिड़़ -तिडा़ए फिरेंगे। पुरुषोत्तम भी क्या आदमी है ? यही बात 40 -45 बार तोहरा -तीहरा चुके हैं। दुनिया भी कह रही है यह क्या आदमी है? अरे अब बहुत हुआ। ऐसी भी क्या लथेरइ है?
ऐसे ही माहौल में नरोत्तम ने सोचा यदि आज पत्नी होती तो सुदामा की पत्नी की तरह कोई ना कोई रास्ता बताती। नाहक ही जन सेवा के दिखावे में पत्नी को छोड़ दिया। फिर उन्हें कृष्ण की याद आई की कैसे उन्होंने मित्र के सारे दुख दूर कर दिए थे। फिर अपने विदेशी मित्र की याद आई और उन्होंने माथा पीट लिया। फिर सोचा नालायक तो है ही किंतु चाह ले तो सब कुछ हल हो सकता है। ऐसी स्थिति में एक बार आजमा लेने में क्या हर्ज है ? फिर उनको सुदामा के हवाले से अपनी पत्नी की याद आई, अगर वह होती तो कम से कम पुरुषोत्तम के खाने लायक किसी चीज की व्यवस्था कर देती जैसे सुदामा की पत्नी ने कृष्ण के लिए चूड़े बांध दिए थे। दुखी होकर मुंह लटका कर बैठ कर सोचने लगे अचानक उन्हें कुछ कौंधा और उन्होंने बावर्ची को बुला भेजा। उसके हाजिर होते ही उन्होंने डपट कर पूछा “मालपुआ बना लेते हो” बावर्ची ने सर झुका कर किंतु दृढ़ता से कहा “जी हुजूर बिल्कुल, बना लेता हूं” फिर तुमने कभी बनाई क्यों नहीं? नरोत्तम ने नरम स्वर में पूछा। हुजूर आजकल डायबिटीज के कारण कौन मालपुआ खाता है फिर किसके लिए बनाता। नरोत्तम के चेहरे पर मुस्कुराहट खिल गई बोले” देखो मुल्क की इज्जत का सवाल है कल सुबह कम से कम 20-25 मालपुआ तैयार करो। कायदे से मेवे वगैरह डाल देना। देखना बहुत मीठे नहीं होने चाहिए। जो सामान न हो आज ही कोठारी से मंगवा लो”। बावर्ची में झुक कर सलाम किया और बोला “बहुत” अच्छा हुजूर”।
इतनी व्यवस्था कर नरोत्तम काफी आस्वस्त हो गए ,किंतु तभी में कुछ याद आया और इन्होंने केयरटेकर को बुला लिया। जल्दी ही केयरटेकर हांफता हुआ आकर खड़ा हो गया। उसको इन्होंने कल की यात्रा का कार्यक्रम बता कर जरूरी व्यवस्था करने का आदेश दिया । उसने झुक कर विनय पूर्वक कहा “जैसी आज्ञा श्रीमान जहाज की टंकी फुल कर देता हूं ,और पूरे स्टाफ को खबर कर देता हूं ‘यह कह कर वह चला गया।
इसके बाद उन्होंने अपने निजी सेवक को बुलाया और कहा “देखो लगभग 5 दिन के लिए बाहर जाना है, इसलिए कम से कम 14 -15 कोट, 30- 35 सदरी, 50 कुर्ता पजामा और 30- 35 पगड़ी तथा 15 जोड़ी जूते कायदे से पैक करवा दो। और तुम तो जानते ही हो सफर का मामला है सामान ज्यादा नहीं होना चाहिए। 14- 15 से ज्यादा बक्से न हों”।
यह सारी हीदायते देकर नरोत्तम ने सुकून महसूस किया और कल का इंतजार करने लगे।
अगली सुबह बड़ी मुस्तैदी से सामान आदि जहाज में लादा जाने लगा और 8 बजते, बजते जहाज में उड़ान भरी। जय श्री राम का नारा लगा, और सभी लोग आराम से अपनी सीटों पर बैठकर उंघने लगे। नरोत्तम आशंका और उत्तेजना में लगातार पहलू बदल रहे थे। सोच रहे थे देखें पुरुषोत्तम क्या-क्या देते हैं ? जैसे-जैसे पुरुषोत्तम मालपुआ खाते जाएंगे वैसे-वैसे अपनी किस्मत बदलती जाएगी। कृष्ण सुदामा की कहानी तो ऐसा ही कहती है।
वहां पहुंचकर नरोत्तम , विधिवत तैयार हुए। आज उन्होंने अपनी बेहतरीन पगड़ी बांध रखी थी। महल के द्वार पर पहुंच कर देखा ,पुरुषोत्तम तो क्या कोई भी लेने नहीं आया था। वहां तैनात गार्ड ने कहा सीधे चले जाइए 100 मीटर आगे सीढ़ियां हैं। ऊपर चढ़ जाएगा बाएं से तीसरे कक्ष में” गरीब नवाज ‘मैडम मालानी के पलंग पर बैठे हुए हैं।’” नाक “कर घुस जाइएगा।
नरोत्तम ने ऐसा ही किया। उनके कक्ष में घुसते ही पुरुषोत्तम धधा कर उठे और गले लग गए। फिर वही पुराना ढंग मेरे देश में में तो सब कुछ ग्रेट ही होता है जैसे ग्रेट लीडर ,ग्रेट कंट्री, ग्रेट सिविलाइजेशन आदि आदि । नरोत्तम को, उनके देश को ,उनकी सभ्यता को और उनके काम को भी पुरुषोत्तम ने ग्रेट बताया। इसी प्रकार पुरुषोत्तम के देशवासी भी , हर चीज से प्यार भी करते हैं ,चाहे आलू हो, मक्का हो ,बिल्ली हो या पत्नी हो । इसी श्रृंखला में पुरुषोत्तम ने नरोत्तम को डियर फ्रेंड, लव यू वगैरह कहते हुए प्यार का इजहार भी कर दिया। यह सब तो भक्तों के काम का था। नरोत्तम पुरुषोत्तम से कम छंटे हुए तो थे नहीं । इस सब पर कुछ खास ध्यान नहीं दिया। वह मालपुआ खींचे जाने का इंतजार कर रहे थे। पुरुषोत्तम को कृष्ण सुदामा की कहानी पता थी वह कहां चूकने वाले थे। उन्होंने झपटकर नरोत्तम की कांख में दबा हुआ डब्बा झपटकर खींच लिया। सब लोग यानी मैडम मालानी उनकी दासियां, सेवक आदि हां हां करने लगे। लेकिन पुरुषोत्तम कहां रुकने वाले थे। उन्होंने डब्बा खोला और इसे सूघां। सूंघकर अच्छा मुंह बनाया और दबा- दब मालपुआ मुंह में झोंकने लगे।,
देखते ही देखते उन्होंने 5-7 मालपुए उड़ा दिए। अब नरोत्तम की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। वह चाहते थे कि पुरुषोत्तम कम से कम 10 -12 मालपुआ तो जरुर खा जाएं। लेकिन तभी क्या हुआ कि मालानी भाभी ने दौड़कर पुरुषोत्तम का हाथ पकड़ लिया और बोली” रुको ,अब बच्चे की जान लोगे क्या? नरोत्तम की आशा पर पानी फिर गया ,लेकिन उन्होंने संतोष करते हुए सोचा चलो पांच सात वरदान भी कहां कम हैं। “दान की बछिया का दांत क्या गिनना”?
इसके बाद चाय पानी का दौर शुरू हुआ। नरोत्तम चूंकि चाय नहीं पीते हैं इसलिए उनको पतंजलि का नया शरबत पेश किया गया। फिर बहुत सी फालतू बातें और हंसी ठहाका हुआ और दोनों मित्र विदा हुए।
लौटते हुए जहाज में भी नरोत्तम को नींद नहीं आई। वे लगातार इस उहा-पोह में रहे कि आखिर मित्र ने क्या-क्या दिया है?
देश पहुंचने पर जहाज से उतरकर वह महल पहुंचे। वहां अजीब सन्नाटा था। जाकर सिंहासन पर बैठे ,और अपने सचिव को फौरन बुलाया ।सचिव अत्यंत दुखी मन से सर झुकाए ,पैर घसीटते हुए आया। आते ही नरोत्तम ने पूछा अमेरिका से कुछ आया? सचिन ने कहा “आया हुजूर” नरोत्तम ने कहा “एक-एक कर जल्दी से बताओ”।
सचिव ने बताना शुरू किया:-
एक -जनरलाइज्ड सिस्टम का प्रेफरेंसेस(जी एस पी) से अपना देश बाहर हो गया।
नरोत्तम ने अपना दिल थाम लिया।
दो -टैरीफ की दर बढा़ कर 50% कर दी गई है। फार्मा पर टैरिफ की दर 100% करने की धमकी दी गई है।
तीन -h1 बी वीजा की फीस $100000 कर दी गई है।
नरोत्तम ने दोनों हाथों से अपना दिल जोर से दबाया।
चार -रुस और ईरान से तेल लेने पर पाबंदी लगा दी गई है।
यह सुनते ही महाराज गस खाकर सिंहासन पर एक तरफ लटक गए।
सचिव ने दौड़कर ए सी का तापमान 2-3 डिग्री नीचे कर दिया। चपरासी मुंह पर पानी के छिटें मारने लगा।
महाराज ने आंखें खोली और अस्फुट स्वर में कहा “अरे मैंने तेरा क्या बिगाड़ा था रे जालिम”। यह कहते-कहते महाराज का दांत फिर लग गया। चपरासी इस बार बर्फ वाले पानी के छिटें देने लगा।
फिर आंख खुली और महाराज ने कहा” अरे मेरा और देश का तो जो होगा वह होगा, उस गरीब अघानी का क्या होग? वह बेचारा तो जेल चला जाएगा, अब उसको कौन सा मुंह दिखाऊंगा?
फिर महाराज में अत्यंत धीमी आवाज में कहा” जगत्तर! जरा मुझे पलंग पर लिटा दो और तुम लोग जाओ।
“होई हैं सोई जो राम रचि रखा।”
भाई उसी ज़मूरे का और उनके बच्चों का नाम और कहां से आए थे बता दो जिसके साथ पुरुषोत्तम "लिल्ली टीटी" कर रहा था।
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